शनिवार, १५ फेब्रुवारी, २०२०

आचार्य  चतुरसेन शास्त्री लिखित 'वैशालीकी नगरवधू'  कादंबरीतील एक अंश
उपन्‍यास के उद्देश्‍य के अनुसार आर्यों की नीचता बताते हुए उपन्‍यासकार एक पात्र द्वारा कहता है-यह आर्यों की पुरानी नीचता है। सभी धूर्त कामुक आर्य अपनी कामवासना-पूर्ति के लिए इतर जातियों की स्त्रियों के रेवड़ों को घर में भर रखते हैं। लालच-लोभ देकर कुमारियों को ख़रीद लेना, छल-बल से उन्‍हें वश कर लेना, रोती-कलपती कन्‍याओं का बलात् हरण करना, मूर्च्छिता- मदबेहोशों का कौमार्य भंग करना- यह सब धूर्त आर्यों ने विवाहों में सम्मिलित कर लिया। फिर बिना ही विवाह के दासी रखने में भी बाधा नहीं।इसी तरह अनार्यों की श्रेष्‍ठता बताते हुए उपन्‍यासकार एक पात्र द्वारा कहता है-सर्वजित् निर्ग्रंथ महावीर और शाक्‍यपुत्र गौतम ने आर्यों के धर्म का समूल नाश प्रारम्भ कर दिया है। उन्‍होंने नया धर्म-चक्र प्रवर्तन किया है जहाँ वेद नहीं हैं, वेद का कर्त्‍ता ईश्‍वर नहीं है, बड़ी-बड़ी दक्षिणा लेकर राजाओं के पापों का समर्थन करने वाले ब्राह्मण नहीं हैं। ब्रह्म और आत्‍मा का पाखण्‍ड नहीं है। उन्‍होंने जीवन का सत्‍य देखा है, वे इसी का लोक में प्रचार कर रहे हैं।

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